मोबाइल और इंटरनेट की चमकती दुनिया



             ओम शांति.... मोबाइल.... जी हां.....जिसकी आवश्यकता आज रोटी, कपड़ा, मकान की तरह हो गई है..... इस यंत्र का प्रयोग दुनिया के किसी भी कोने में सरलता से कर सकते हैं.... एक दूसरे से बातचीत करने के लिए । अगर मोबाइल के लाभों पर दृष्टिपात करें तो देखेंगे कि विद्यार्थी वर्ग, उद्योगपति,ऑफिस कर्मचारी, शिक्षक वर्ग, विज्ञान से संबंधित और अन्य सभी वर्ग अपने अपने व्यवसाय के लिए इसके द्वारा अपनी कार्यों और ज्ञान में वृद्धि करते हैं....अपनी बातें लोगों के साथ साझा कर सकते हैं... कठिन परिस्थितियों में गांव हो या शहर, संदेशों को किसी भी स्थानों में भेज सकते हैं!! पर कहते हैं ना, कि अति हर चीज की बुरी होती है।

InThis Article

  • मोबाइल फोन की उपयोगिता  
  • मोबाइल फोन के हानिकारक प्रभाव
  • इंटरनेट सेडनेस
  • मोबाइल फोन के प्रयोग से रचनात्मकता पर असर
  • कुछ उपाय, जिससे दिमाग का हर हिस्सा रहे सक्रिय
  • निष्कर्ष

"हमारी उड़ान" का लक्ष्य है……

स्वयं में बदलाव लाकर अपनी जिंदगी को खुशनुमा बनाना।
स्वयं में बदलाव लाकर विश्व परिवर्तन करना।

आज के इस समय में मोबाइल, इंटरनेट की अधिकता,उसका संपर्क इतना अधिक बढ़ता जा रहा है कि हर आयु वर्ग के लोगो पर इसका प्रभाव नकारात्मक अधिक पड़ रहा है...इसको हम नकार नहीं सकते !


 मोबाइल फोन के हानिकारक प्रभाव

 

आज के इस तकनीकी युग में यह तो सभी जानते हैं कि मोबाइल फोन में जिस विद्युत चुंबकीय विकिरण का प्रयोग होता है, वह मानव के स्वास्थ्य को हानि पहुंचाता है। 31 मई 2011 में विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार मोबाइल फोन का लंबे समय तक प्रयोग...शारीरिक अंगों के लिए घातक हो सकता है, उनके अनुसार मोबाइल फोन का 10 वर्ष से अधिक प्रयोग उनमें ब्रेन ट्यूमर का खतरा दोगुना कर देता है, इसके अलावा अवसाद, तनाव, कमजोर प्रतिरक्षा प्रणाली, बीमारियों का खतरा, शरीर के कई अंगों में दर्द होना,पेट में दर्द, दृष्टि का कमजोर होना ,मोटापा, शारीरिक मुद्रा में परिवर्तन, गाड़ी चलाते समय दुर्घटना की संभावना, गर्भवती महिलाओं पर प्रभाव, भावनात्मक समस्याएं, विचारों में तेजी से उतार-चढ़ाव आदि होता है।



विद्युत चुंबकीय विकिरणों का नकारात्मक प्रभाव


सिर्फ मानव पर ही नहीं बल्कि इसके विषाक्त पदार्थ घुलने से और मिट्टी के अंदर दबाने से, मिट्टी भी प्रदूषित हो जाती है, क्योंकि मोबाइल फोन को बनाने में प्रयोग किए गए द्रव्य.....कैडमियम, लिथियम, तांबा, सीसा, जस्ता, और पारा जो कि विषाक्त माने गए हैं।

  एक और अनुसंधान के अनुसार मोबाइल फोन की उपस्थिति के कारण मनुष्यों के रिश्तो में तनाव का स्तर बढ़ गया है..क्योंकि मौखिक वार्तालाप अथार्त आमने-सामने बातचीत की कमी के कारण, आपसी रिश्तो में मधुरता और सौहार्द्र कम हो गया है।


रिश्तो के सौहार्द को छीनती मोबाइल की दुनिया



इंटरनेट सेडनेट

क्या यह कोई नई बीमारी है? नहीं... यह मानसिक सेहत से जुड़ा एक शब्द है....जो आज हमारी जिंदगी की सच्चाई बनता जा रहा है। घर के सभी सदस्य घंटों स्क्रीन पर स्क्रॉल करते हैं...जिससे अकेलापन बढ़ रहा है.... यह उदासी का कारण भी बन रहा है।

लोग डिजिटल दुनिया में एक दूसरे की वाहवाही तो कर रहे हैं, मगर असल जिंदगी में लोगों से रूबरू नहीं हो रहे..यही दूरी अब मानसिक समस्या के रूप हमारे सामने आ रही है।

वास्तव में इंटरनेट एक दोधारी तलवार है....जिसमें थोड़ी सी भी असावधानी हमारे लिए खतरनाक हो सकती है । शोध भी मानते हैं कि बार-बार बिना किसी काम के स्क्रीन पर स्क्रॉल करना, दिमाग को थकता है ! एक शोध में यह दावा किया गया कि इंटरनेट के अत्यधिक इस्तेमाल से कल्पनाशीलता और रचनात्मक शक्ति में कमी आती है, इससे हमारी एकाग्रता, याद रखने की प्रक्रिया और सामाजिक व्यवहार पर असर पड़ सकता है!

 टैक्सास यूनिवर्सिटी के एक शोध में पाया गया है कि विश्व स्तर पर इलेक्ट्रॉनिक गैजेट का समान 90 % बढ़ा है...जो अब मानसिक थकान की वजह बन रहा है । यह एक अलग ही है कि एक औसत स्मार्टफोन यूजर 1 दिन में लगभग 45 से 63 बार अपनी डिवाइस को चेक करता है! इंटरनेट की लत के शिकार लोग मानसिक रूप से इतने विचलित हो जाते हैं, कि उन्हें अपने दैनिक कार्यो को निपटाने में ज्यादा परेशानियों का सामना करना पड़ता है, जिससे वे किसी भी कार्य को सफलतापूर्वक पूरा करने में असमर्थ रहते हैं, जो उनकी परेशानी या बेचैनी का कारण बनता है !


रचनात्मकता  पर असर

एक शोध में यह दावा किया गया कि इंटरनेट के अत्यधिक इस्तेमाल से कल्पनाशीलता और रचनात्मक शक्ति में कमी आती है, इससे हमारी एकाग्रता, याद रखने की प्रक्रिया और सामाजिक व्यवहार पर असर पड़ सकता है!

  एक रिपोर्ट के अनुसार 1998 में रोजाना गूगल सर्च की औसत संख्या 9800 थी, जो 2019 में बढ़कर 5.8 अरब से अधिक हो गई ,लोगों की इस पर बढ़ती निर्भरता का अंदाजा इन आंकड़ों से लगाया जा सकता है !!

कारण इंटरनेट असंभव, अनुपलब्ध, डाटा और जानकारियां हमें सहज ही उपलब्ध करा देता है,वह भी बस एक छोटी सी क्लिक के माध्यम से। इंटरनेट की इस उपयोगिता को किसी भी तरह नकारा नहीं जा सकता।


हर उम्र और वर्ग की पहुंच में..मोबाइल


दिमाग का हर हिस्सा रहे सक्रिय

 

मस्तिष्क में 2 हिस्से होते हैं.... संज्ञानात्मक और भावनात्मक.. संज्ञानात्मक हिस्सा हमें सीखने और समझने में मदद करता है, हमारा दिमाग सही और संतुलित तरीके से तभी काम करता है, जब मस्तिष्क के दोनों हिस्सों क्रियाशील होते हैं, लेकिन जब हम इंटरनेट पर बेमतलब का समय गुजारते हैं, मस्तिष्क का संज्ञानात्मक हिस्सा सुस्त हो जाता है.. अर्थात फुर्सत में आ जाता है ! हम इंटरनेट और स्मार्टफोन पर जितना ज्यादा समय फालतू काम करते हुए बिताते हैं, या बिताएंगे...। संज्ञानात्मक हिस्सा उतना ही ज्यादा खाली रहने लगेगा। इससे धीरे-धीरे हमारे सोचने, सीखने, समझने और चीजों को तार्किक ढंग से परखने और सही निर्णय लेने की क्षमता प्रभावित होने लगती है। कुछ विशेषज्ञों ने इस समस्या को डिजिटल एमेंशिया का नाम दिया है ।

तकनीक पर भरोसा करना हमारे दिमाग को आलसी बना रहा है.... हमारा दिमाग तेजी से याद करने की क्षमता को खो रहा है..क्योंकि हम डाटा के लिए प्रौद्योगिकी पर तेजी से निर्भर हो रहे हो, यहां तक कि बहुतों को अपना फोन नंबर भी कई बार याद नहीं होता....उसे भी उन्हें फोन बुक से निकालना पड़ता है....हालांकि दिमाग पर थोड़ा जोर डालने के बाद याद आ जाता है,😊..लेकिन दिमाग में झांकने से ज्यादा आसान है, कि फोन बुक में झांक लिया जाए, इस तरह से दिमाग को आलसी बना रहा है इंटरनेट। 


निष्कर्ष

इंटरनेट को माध्यम माने, अपना दोस्त नहीं। यहां हम सब को समझना होगा कि इंटरनेट और मोबाइल एक टूल है, और उसे टूल की तरह ही इस्तेमाल किया जाना चाहिए। डिजिटल युग में हमें यह तय करना है कि स्क्रीन पर बिताया गया समय सार्थक और सीमा में हो। बेशक तकनीक के उचित इस्तेमाल से लोगों के जीवन में कई लाभ हैं । लेकिन इसका अत्यधिक प्रयोग लोगों में बेचैनी और उदासी भी दे रहा है,और हमें मानसिक रोगी भी बना रहा है।

इंटरनेट के नशे में हम पहले से ही थे लेकिन महामारी के इस दौर में इस पर निर्भरता बढ़ गई है। कुछ समय पूर्व तक हम उंगलियों पर हिसाब करते थे, अपने आसपास के मुख्य लोगों के नंबर याद रखते थे, अपने जीवन की महत्वपूर्ण तिथियां भी याद रखते थे। जो अब पुरानी बात हो गई है, तो इस स्थिति से बचने के लिए, अपनी याददाश्त को बचाने के लिए हमें कुछ निर्णय लेने होंगे जैसे कि...।।

  • अपने अमूल्य समय को अपने दोस्तों, परिवारजनों और बच्चों के साथ बिताए। और इस तरह शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य के साथ-साथ अपने आसपास सकारात्मकता और खुशियां बढ़ाएं।
  •  अपने स्मार्टफोन पर अपने पसंदीदा उपन्यास को पढ़ने के बजाय लाइब्रेरी या बुक स्टोर पर जाएं।
  •  स्मार्ट फोन और इंटरनेट को छोड़कर, कुछ समय अपने शौक पर भी कार्य करें जैसे खाना बनाना, पेंट करना, डांस करना या म्यूजिक....आप जो भी पसंद करते हैं, वह आपके शौक को वापस पाने और खुद पर कुछ समय बिताने का समय है, इससे एकाग्रता बढ़ती है।
  •  सप्ताह में कम से कम 1 दिन स्क्रीन मुक्त दिन तय कर ले, इस दिन कॉल करने और रिसीव करने के अलावा किसी अन्य चीज के लिए फोन का इस्तेमाल करने से बचें।
  •  जहां तक हो सके कॉल करने के लिए लैंडलाइन है, तो उसका उपयोग करें।
  •  हर जगह जीपीएस का उपयोग करने के बजाय गूगल मैप के नक्शे देखने के बाद मस्तिष्क में सेट करें और गंतव्य पर पहुंचने का प्रयास करें।
  • लंबी वॉक ले और प्रकृति के साथ समय बिताएं, तन और मन की सेहत को तरोताजा करें।
  • टेक्स्ट मैसेज के द्वारा अपना अधिक से अधिक काम करें।

 'मोबाइल और इंटरनेट की चमकती दुनिया' अवश्य  हमारी अत्यधिक उपयोगी और चमकती हुई दुनिया है। हमें यह देखना है कि हम इस चमकती हुई दुनिया में स्वयं को, अपने रिश्तो को, अपनी क्षमताओं को, अपने सौहार्द और प्यार को खो तो नहीं रहे हैं? मोबाइल और इंटरनेट हमारे उपयोग के लिए केवल एक साधन है जो हमें सुख देते हैं, जिससे हमें सुविधा मिलती है। यह तो सभी को पता है कि हमारी जिंदगी में रिश्ते प्रमुख है? या मोबाइल? जवाब होगा -रिश्ते।

 हमारी उड़ान वेबसाइट पर आने के लिए आप सबका धन्यवाद।
धन्यवाद 😊🙏✍️














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