परमात्मा शिव पिता की पूजा अलग क्यों?

       ओम शांति ..... भारत एक ऐसा देश है, जहां कहते हैं.... 365 दिन और 366 त्योहार.... उसमें भी एक विशेष त्यौहार का जिक्र हम यहां करना चाहते हैं.. जो हमारी जिंदगी को, कठिनाइयों से हल्का करने में मदद करता है, और वह महान त्यौहार है ... महाशिवरात्रि ... यह शब्द सुनते ही आप सभी के चेहरे भी खुशी से खिल गए ना, पर फिर अगले ही क्षण मुरझा जाते हैं, लेकिन चाहते तो है कि सदा हमारे जीवन में खुशियां बनी रहे.....।

In This Article

  1.  जीवन की समस्याओं में उलझा मानव जीवन
  2.  एक महान पर्व - शिवरात्रि
  3.  शिव परमात्मा की पूजा अलग क्यों.
  4.  पांच संकल्पों द्वारा पांच विकारों से मुक्ति
  5.  निष्कर्ष

"हमारी उड़ान" का लक्ष्य है……
स्वयं में बदलाव लाकर अपनी जिंदगी को खुशनुमा बनाना।
स्वयं में बदलाव लाकर विश्व परिवर्तन करना।

जीवन की समस्याओं में उलझा मानव जीवन

   आज अज्ञान अंधकार सर्वव्यापक है.... अगर इसके तह में जाएंगे, तो देखेंगे की समस्या कोई बाहर से नहीं आती... समस्या हमारे भीतर ही मौजूद है, जो निरंतर हमारे दुख को बढ़ाती रहती है.... मनुष्य हर पल हर क्षण अपने विवेक का खून करता रहता है, और कोल्हू के बैल की तरह समस्याओं के जाल में फँसा रहता है। वह सब जानता है कि मैं क्या गलत कर रहा हूं फिर भी रोना रोता है कि मैं क्या करूं... इन सब गलत कार्यों के बिना चल भी तो नहीं पाता... उलझने इतनी हैं कि सोने जा रहे हैं, तो नींद नहीं आती... खाना खाते हैं, तो उसका आनंद नहीं आता।

  कहना और करना दोनों ही समान होने चाहिए...लेकिन वह नहीं होता... बस हम जैसे तैसे और 'चलती का नाम गाड़ी' जैसे जीवन काटते हैं.... और जो मनुष्य के पास होता है, वही वह दूसरों को भी बांटता है, और जो बांटता है... वही लौटकर उसके पास आता है.. तो इससे समस्या की वृद्धि होती जाती है... इन सब से पार निकलने के लिए हमें हिम्मत जुटाने होगी और साहस के साथ कदम आगे बढ़ाने होंगे।…हमें अध्यात्म की ओर कदम बढ़ाना होगा.. अध्यात्म क्या है इसेे समझें। 


      शिव को अजन्मा कहते हैं,  और साथ-साथ मृत्युंजय भी कहते हैं,  जिनका जन्म नहीं होता और जिन्होंने मृत्यु को भी जीत लिया है,  वे सदा मुक्त हैं, करमातीत हैं, लेकिन फिर भी वह सब को मुक्त करने के लिए मुक्तिदाता बनकर आते हैं।

शिव परमात्मा के अनेक नाम

एक महान पर्व - शिवरात्रि

   
        शिवरात्रि... इस शब्द का संधि विच्छेद करें तो शिव+ रात्रि होता है.. शिव माना कल्याण, शिव माना रोशनी, शिव माना शुभ, शिव माना श्रेष्ठ, शिव माना सत्य। तभी तो कहते हैं.. सत्यम शिवम सुंदरम... क्योंकि सत्य पर आधारित कर्म फल ही शुभ, सुंदर और श्रेष्ठ होता है.... और रात्रि का अर्थ है अंधकार।... अंधकार अर्थात... कुछ ना सोचना, उदास होना, मूड ऑफ होना, दुख दर्द का बढ़ना। क्योंकि रोशनी नहीं है.... तो कुछ दिखता नहीं और ना दिखने के कारण कर्म उल्टा पुल्टा हो जाता है.... और उसका फल दुखदाई होता है... अप्रिय अंधकार किसी को भी अच्छा नहीं लगता। तो शिवरात्रि का अर्थ है.. सत्य ज्ञान की रोशनी का पर्व... रोशनी होने से ना रहेगा अंधकार, ना समस्याएं होंगी, ना होगा दुख। और शिवरात्रि का रहस्य समझ आने से चेहरे पर खुशी, मुस्कुराहट और सुंदरता आ जाएगी। शिवरात्रि का त्योहार आपके जीवन में खुशियां लाए, ऐसी हमारी शुभकामना है 😊

शिव परमात्मा की पूजा अर्चना अलग क्यों?

   महाशिवरात्रि पर कई भक्त व्रत रखते हैं, उपासना करते हैं, मंत्र जाप करते हैं, और परमात्मा शिव से वर मांगते हैं।  शिवरात्रि आ रही है... भगवान शिव के हम सब भक्त उनके मंदिरों में जाएंगे, और हर साल की भांति बेर, अक, धतूरा, कच्चा दूध पानी मिला.. सभी उनको अर्पित करेंगें। सोचने की बात यह है कि भगवान शिव इन चीजों का क्या करेंगे? हम देवताओं पर कई प्रकार के पुष्प चढ़ाते हैं मीठे फल चढ़ाते हैं पर..... एक ही परमपिता परमात्मा शिव की यादगार में शिवलिंग पर हम धतूरा और अक के फूल चढ़ाते हैं ऐसा क्यों??

      हम भगवान से मांगते वरदान और अच्छी चीजें हैं, लेकिन चढ़ाते कड़वी चीजें हैं, क्या कभी आपने इस रहस्य को जानने की कोशिश की? 

 कड़वी चीजें अथार्त बुराइयां 

    हर व्यक्ति के अंदर कोई ना कोई अच्छाई तो है... परंतु उसमें बुराई भी ज्यादा हावी है... पांच विकार.. काम,  क्रोध,  लोभ,  मोह,  अहंकार इसी के प्रतीकात्मक रूप में हम इन कड़वी चीजों को चढ़ाते हैं.... इसका अर्थ है कि हमें अपने जीवन में दुख देने वाली कड़वी चीजों को छोड़ना है, दृढ़ संकल्प करना है कि मैंने इन पांचों चीजों को, पांचों विकारों को,  परमात्मा को पूरी तरह से अर्पण कर दिया.... जब हम यह संकल्प करते हैं तभी तो शिवरात्रि पर परमात्मा से सच्चा वर प्राप्त करते हैं। 

 बेर चढ़ाएं पर,  वैर भी अवश्य चढ़ाएं 

      भगवान की महिमा में गाया जाता है... वह निर्भय और निर्वैर हैं,  अपने बच्चों को भी अपने समान ही देखना चाहते हैं,  वे चाहते हैं कि मेरा हर बच्चा अपने मन का भय और वैर मुझे अर्पण करें। वैर और शत्रुता के चलते हम कई मनुष्यों से दूरी बना लेते हैं, और परिणाम स्वरूप उनसे होने वाले फायदों से भी वंचित हो जाते हैं... तो विचार कीजिए कि इतने वर्षों में हमने शिवलिंग पर बेर तो चढ़ाएं... परंतु मन के वैर, विरोध और शत्रुता को चढ़ाया क्या?


अक और धतूरा के बदले कड़वी जुबान 

       भगवान शिव कहते हैं कि आप मेरे  बच्चे हो,  किसी भी शुभ अवसर पर सबका मुंह मीठा कराया जाता है,  प्रसाद में भी मीठी चीज ही दी जाती है,  फल भी मीठा पसंद आता है,  और मानव भी तभी अच्छा लगता है जब उसके शब्द मीठे और मन को राहत देने वाले हो.... इसलिए शिव परमात्मा ने कहा,  इस कड़वी जुबान को,  कटु दृष्टि को,  मुझ पर अर्पण करो, मैं तुम्हारे भंडारे भरपूर कर दूंगा, हम जानते हैं कि जबान  कड़वी तब होती है, उस से  पहले मन कड़वा होता है,  जब मन कड़वा होता है तब अहंकार, मै पन और देह अभिमान आता है... यह सभी भंडारे खाली करने वाले हैं। 

सांसारिक प्राप्तिओ के नशे का त्याग

         हम भगवान पर भांग चढ़ाते हैं, धतूरे के फूल चढ़ाते हैं,  गांजा चढ़ाते हैं,  लेकिन भगवान ने हमें कहा कि नशा (अहंकार)  नहीं करना है,  और हमने समझा कि भगवान नशीली चीजें मांग रहे हैं... और चुन-चुन कर उनको नशे वाली चीजें अर्पित कर दी।  भगवान ने कहा कि सांसारिक चीजों का नशा मत रखो... यह सब चीजें अल्पकाल की है,  परंतु हम ठहरे नादान बच्चे,  हमने भारी नशीली चीजें ही उनको चढ़ा दी,  इस कारण भी हमारे घर की सुख शांति के भंडारे भरपूर नहीं हो पाए। 

   परंतु ऐसा नहीं है कि नकली चढ़ावा चढ़ाने वाले भक्तों से भोला नाथ शिव को प्रेम नहीं है,  प्रेम के सागर,  शिव परमात्मा अपने भक्तों पर खूब प्रेम लुटाते हैं,  उनकी नादानी से भी उनको प्रेम है, वो नकली चढ़ावे को भी शुभ भावना के साथ स्वीकार करते हैं.. कि आने वाले समय में असली चढ़ावा...  तन,  मन,  धन भी अवश्य अर्पण करेंगे। 

जानिए अनहद नाद को


   जैसे पहली कक्षा के बच्चे जब पढ़ते हैं... तो आवाज करते हैं... जोर-जोर से बोलकर पढ़ते हैं.. परंतु बड़े बच्चे एकांत में और   मौन  पढ़ा करतें  हैं.. भक्ति है पहली क्लास.... इसमें भक्त उच्च स्वर में गीत, संगीत, भजन,  मंत्र उच्चारण अधिक करते हैं... परंतु ज्ञान मार्ग में आते ही उनकी साधना,  मंत्र जाप, मौन वाली हो जाती है। 

   तो हे शिव भक्तों... आप इतने बरसों से शिवरात्रि का जागरण पहली क्लास के बच्चों जैसे उच्च स्वर में कर रहे हैं,  तो अब अगली कक्षा में बढ़िये,  वाणी से परे निर्वाण का आनंद लेना सीखिए, अनहद नाद और मन मनाभव का मंत्र जानिए। 

     नयापन हर एक को पसंद आता है.... तो शिवरात्रि को मनाने में भी नयापन लाइए... कि कहते हैं ना... पुराना करेंगे तो वही पाते रहेंगे। नया करेंगे तो नया पाएंगे तो  सबसे पहले  नयापन अपने चढ़ावे में लाइए,  बनावटी चीजें न चढ़ा  करके अपनी बुराइयों की बलि चढ़ाईऐ। 

तो चलिए 5 संकल्पों के द्वारा हम पांच विकारों से मुक्ति पाने के लिए इस शिवरात्रि पर संकल्प करते हैं.

  • मन को करें साफ,  औरों को करें माफ

कोई हमारी निंदा या विरोध करके अपने ऊपर पाप का बोझ चढ़ाता है,  तो हमें उसे माफ कर देना है,  उससे घृणा नहीं करनी है, और ना ही अपने मन को मैला करना है,  इस शुभ त्यौहार पर हमें हमेशा के लिए इस को तिलांजलि दे देनी है।     

  •  गुलामी की सदा के लिए नीलामी

आज मनुष्य मोह माया का गुलाम है, काम,  क्रोध,  लोभ, मोह, अहंकार आदि विकारों के बंधक बने हुए हैं,  विकारों से छूटने के लिए इस त्यौहार पर इस से मुक्ति पाने का संकल्प लें। 

  • ना नाराज होना है,  ना नाराज करना है

किसी को हमें नाराज नहीं करना है,   हमें न स्वयं दुख पाना है और ना ही दूसरों को दुखी करना है,  हमें दूध और चीनी की तरह सब से मिलकर रहना है,  और शिव परमात्मा के सामने यह संकल्प लेना है, 

  • मायूसी से निकल खुशी से नाता जोड़े

बेबसी को छोड़ा जाए और इसके लिए आत्मविश्वास को जगाया जाए,  माया से पूर्णता मुख मोड़ करके,  ईश्वर से नाता जोड़ा जाए,  तो इससे आंतरिक खुशी बढ़ेगी

  • मन साफ तो मुराद हासिल

जिस प्रकार हम बाहरी सफाई पर ध्यान देते हैं, ऐसे ही इस शिवरात्रि पर हमें सच्चाई के साथ मन,बुद्धि को साफ कर उसे स्वच्छ बनाना है, स्व और दूसरों के लिए मन में श्रेष्ठ, शुभ और शुद्ध संकल्पों को सृजित करना है और उसे हमेशा कायम रखना है।j





           शिव पुराण में लिखा है कि मैं वृद्ध मानव तन में प्रवेश करता हूं, और सारी सृष्टि में ज्ञान दे करके फिर से सुख,  शांति,  समृद्धि की दुनिया को स्थापित करता हूं,  तो इस शिवरात्रि के अवसर पर हम अपने परम पिता को जाने,  समझे,  पहचाने और उनसे संबंध जोड़ कर पुनः हम अपने आप को पावन बनाएं और मन इच्छित पावन दुनिया में चले,  तो चलेंगे ना.😊.. इसके लिए अपने उस प्यारे परमपिता परमात्मा से मिलन की विधि और पहचान भी प्राप्त करें । जहां आप रहते हैं... उसके आसपास में परमात्मा द्वारा स्थापित प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय के सेवा केंद्रों से संपर्क करें.... अब नहीं तो कभी नहीं...

ब्रह्माकुमारिस के चैनल, पूरी जानकारी।

 निष्कर्ष 


          शिव सभी देवों के आराध्य हैं,   हम उन्हें सदाशिव और सत्यम शिवम सुंदरम कहतेे हैं..... उन्हें परम ज्योति बिंदु रूप में सभी धर्मों ने स्वीकारा,  जो परमात्मा शांति का सागर है, प्रेम का सागर है, शक्ति का कुंज है,  ज्ञान का भंडार है,  तो फिर हम क्यों इन सब चीजों से वंचित है,  क्योंकि हम तो गाते हैं.... त्वमेव माता स्च पिता त्वमेव.. हमारा पिता और बच्चे का संबंध है,  तभी तो गाते हैं। स्वरूप में हम आत्माएं अपने परमपिता परमात्मा ज्योति बिंदु के समान हैं... तो गुणों में हम उनके समान क्यों नहीं?
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 धन्यवाद🙏😊✍️  

 विचारणीय 

       जिस तरह लौकिक पिता अपनी संपत्ति को अपने बच्चों को वसीयत में देता है,  उसी प्रकार उस अलौकिक पिता परमात्मा  शिव के बच्चे.. हम पूरी तरह से खाली क्यों है? हम परमात्मा की शक्तियों और गुणों को प्राप्त क्यों नहीं कर पा रहें?  अवश्य ही कोई कमी रह जा रही है, जिसका प्रमुख कारण है..... परमात्मा का सत्य परिचय ना पाना और दूसरा,परमात्मा के साथ संबंधों को सही तरीके से और इमानदार  होकर ना निभाना। आने वालेेेेे लेखों में हम यह देखेंगे कि परमात्मा के साथ किस तरह संबंधों को जोड़ा जाए, और उनकी शक्तियों को कैसे योग द्वारा प्राप्त किया जाए!! 😊 ताकि सर्वशक्तिमान परमात्मा शिव के बच्चे हम सब भी मास्टर सर्वशक्तिमान कहलाए। परमात्मा से संबंध जोड़ने की विधि समझने के लिए पढ़ें....

राजयोग मेडिटेशन1
 राजयोग मेडिटेशन 2


 परमात्मा किसको कहेंगे? क्या सभी धर्मों में उनकी मान्यता है? क्या गीता के भगवान ही परमात्मा है? उनका स्वरूप क्या है? सब कुछ जानने के लिए पढ़ें :----


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