ॐ शांति......'योग' शब्द का प्रयोग हम जीवन में कई बार करते रहते हैं। संबंध, मिलन और जोड़ को सरल शब्दों में योग कहते हैं। जब एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति से मिलकर कुछ कार्य करता है, तो उसको 'सहयोग' कहते हैं। जब अचानक मिलन होता है, तो उसे 'संयोग' कहते हैं। जब किसी शुभ अवसर पर आपस में मिलते हैं, तो उसे 'सुयोग' कहते हैं....इस तरह से योग शब्द का प्रयोग हम अक्सर करते हैं, लेकिन राजयोग का सरल अर्थ है.... निस्वार्थ भाव से परमात्मा की स्नेह भरी याद। यह सर्वश्रेष्ठ याद है।
In This Article
- योग और राज योग के सरल अर्थ
- एक दूसरे को याद करने का आधार
- परमात्मा को याद करने के आधार
- परमात्मा के साथ दास का संबंध
- परमात्मा के साथ मात पिता और बच्चे का संबंध
- राजयोग मेडिटेशन
- निष्कर्ष
मनुष्य, मनुष्य को जब याद करते हैं तो यह टेलीपैथिक याद है। इसी प्रकार जब आत्मा, परमात्मा को याद करती है तो यह भी एक टेलीपैथिक कनेक्शन है...परंतु किसी की याद ऐसी ही नहीं आती बल्कि उसके भी कुछ आधार हैं...। मनुष्य किसी को याद करता है तो उसके चार आधार हैं:--
एक दूसरे को याद करने के आधार
पहला परिचय ≈ आपने अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में यह तो देखा ही होगा कि जब तक हमारा किसी से परिचय नहीं होता, हमें उसकी याद नहीं आती..और जब परिचय हो जाता है,तो याद सहज और स्वाभाविक हो जाती है, जैसे घर के विशेष कार्यक्रम में हम अपने परिचितों को एक-एक कर याद करते हैं, और उन्हें निमंत्रण भेजते हैं.... हमें इस कार्य के लिए मेहनत करनी पड़ती है।
दूसरा आधार है संबंध ≈ जब किसी के साथ हमारा संबंध जुड़ जाता है तो उस आधार पर हमारी याद भी सहज़ हो जाती है। संबंध वाली याद सताने वाली याद है ! मां और बच्चे का संबंध...मां को हर पल अपनी दूर बैठे बच्चे की याद सताती रहती है।तीसरा आधार है स्नेह ≈ जिसके साथ हमारा घनिष्ठ प्यार हो, स्नेह हो, तो इस आधार पर हम उनकी याद में खो जाते हैं, समा जाते हैं, स्नेह वाली याद में सुख मिलता है, और उस याद से लोग बाहर निकलना ही नहीं चाहते !! विवाह योग्य युवक और युवतियों की याद ऐसी ही है...जब तक उन्हें मालूम नहीं है कि इनके भविष्य का साथी कौन है? तब तक उनकी याद भटकती रहती है… परंतु जिस दिन परिचय हो जाएगा …..आपसी संबंध जुड़ जाएगा, तब कहना नहीं पड़ेगा कि आप अपने भविष्य के साथी को याद करो!!तब यह याद स्वाभाविक हो जाएगी! तो इस तरह जहां स्नेह है.. हम वहां याद में समा जाते हैं ।
चौथा आधार है प्राप्ति ≈ हमें यह पता हो कि फलां जगह से हमें कुछ मिलने वाला है, तो उस प्राप्ति के आधार पर हमें स्वाभाविक ही याद आती है..। संपर्क जुड़ते ही और प्राप्ति हो जाने के पश्चात याद भी पूरी हो जाती है.. इसमें अक्सर व्यापारिक और लेन-देन वाली याद आती है।
परमात्मा को याद करने के आधार
अब हम अपने आप को देखें कि ईश्वर के साथ हमारी याद किस प्रकार की है? क्या हमें उसको याद करना पड़ता है?क्या ईश्वर की याद हमें सताती है?क्या उनकी याद में हम खो जाते हैं? क्या उनकी याद में हम समा जाते हैं? क्या ईश्वर के प्रति हमारी याद स्वार्थ भरी याद है?
इंसान की याद इतनी सहज और ईश्वर की याद इतनी मुश्किल!! होना तो यह चाहिए कि ईश्वर की याद इतनी सहज हो !
इसका कारण है कि याद के जो 4 स्तंभ या आधार हैं...वह ईश्वर के संबंध में स्पष्ट नहीं है... पहला परिचय ना होने के कारण किसी ने कह दिया कि यह भगवान है तो उसी को याद करने लग पड़ते हैं, किसी ने दूसरा रास्ता बता दिया,तो उसको याद करने लगे...अतः जहां परिचय स्पष्ट नहीं है, रूप स्पष्ट नहीं है, तो मन को किस पर और कहां एकाग्र करें?
परमात्मा के साथ दास का संबंध?
योग नेचुरल हो, तो उसके पहले आवश्यकता है कि ईश्वर के साथ स्पष्ट परिचय हो, ईश्वर के साथ अपने संबंध की जानकारी हो। ईश्वर के साथ हमारा संबंध है...हम प्रार्थना में गाते हैं... त्वमेव माता शच पिता त्वमेव। एक ओर हम गाते हैं कि तुम माता पिता हम बालक तेरे, परंतु कभी बालक बनकर उनको याद किया ? वह माता पिता है.. तो कभी हमारा व्यवहार इसके अनुरूप रहा ? दूसरी और फिर यह भी कह देते हैं - हे प्रभु हम तो चरणों के दास हैं. अब हमें स्वयं से पूछना है कि हम क्या हैं? क्या परमात्मा मालिक है,और हम उनके दास है! क्या यह उचित है? या फिर वह माता-पिता है और हम उनके बच्चे? दोनों बातें एक साथ नहीं हो सकती !
दास अथार्त जो कभी राजी नहीं रहता...सदा उदास रहता है, इसलिए उसको दास कहते हैं। दास का संबंध मालिक के साथ उतना ही है जितना मालिक को आवश्यकता है.. एक उदाहरण से समझते हैं..अगर दास मालिक के पास आकर कहे कि मुझे ₹100 की आवश्यकता है तो मालिक अवश्य पूछेगा ₹100 की आवश्यकता क्यों है? दास की आवश्यकता को ध्यान देने पर मालिक समझेगा कि यह काम तो सिर्फ ₹25 में पूरा हो सकता है अतः मालिक उसको ₹50 देकर कहेगा कि अभी 50 ले लो फिर बाद में ले जाना... जितना मांगा उसका आधा उसे मिला क्योंकि मालिक और दास का संबंध स्नेह का नहीं है। अगर बच्चा आता है और अपने पिता से कहे कि उसे ₹10 की जरूरत है, छुट्टा ना होने पर पिता उसे ₹100 का नोट देगा कि नहीं? अवश्य देगा…. अंतर है दास एवं बच्चा बनने में।
परमात्मा के साथ मात पिता और बच्चे का संबंध
अगर हम ईश्वर के बच्चे बन जाएंगे तो बिना मांगे भी सब कुछ मिलेगा ! हमारा संबंध ईश्वर के साथ विश्वास और प्यार के आधार पर होगा ! तब बिना मांगे भी मोती मिलेंगे!
स्वयं को ईश्वर का दास कहने के पीछे एक भावना है कि मन में किसी प्रकार का अभिमान ना आए। लोग परमात्मा के सामने स्वयं को नीच हूँ,पापी हूं..।भी बोलते हैं परंतु जब ऐसे लोगों को किसी ने कह दिया कि तुम नीच हो,पापी हो, तो क्या उसे गुस्सा नहीं आएगा? अवश्य आएगा। अगर उसे याद दिला दी जाएगी भाई अभी-अभी तो तुम मंदिर में ऐसा कह रहे थे.. मैं नीच हूं,पापी हूं,फिर अब तुम्हें यह बात बुरी क्यों लग रही है... तो बताएगा कि उसने तो यह बात परमात्मा के समक्ष कही है,मनुष्य के समक्ष नहीं। तो परमात्मा के समक्ष कुछ और...मनुष्यों के समक्ष कुछ और । वास्तविकता आखिर क्या है?दोनों ही अज्ञान है! यही वह कारण है कि ईश्वर के साथ हमारा योग नहीं लगता।
जहां संबंध स्पष्ट होता है...वहां याद भी स्नेह से भरी होती है,उस सनेह भरी याद में हम बंध जाते हैं, खो जाते हैं, और उस याद में हमें सुख मिलने लगता है, मन स्थिर होने लगता है, परमात्मा से योग सहज ही लगने लगता है और परमात्मा से प्राप्ती भी स्वत: ही होने लगती हैं....फिर मांगने की आवश्यकता नहीं पड़ती है.... प्रभु सुख दो, शांति दो, यह दो, वह दो...आदि आदि।
भगवान को दयालु, कृपालु कहा जाता है, उसका देने का हाथ सदा ही हमारे ऊपर बना रहता है, अगर हम बच्चे हैं, तो बच्चे बनकर भी रोज मांगना पड़े,क्या यह कभी हो सकता है ? माता-पिता ही फिक्र करते हैं कि बच्चे को क्या चाहिए और उस अनुसार देते रहते हैं !! बच्चा तो निश्चिंत रहता है!
राजयोग मेडिटेशन
राजयोग मेडिटेशन में हम आत्माएं बच्चे बनकर अपने परमपिता परमात्मा शिव से योग लगाते हैं, जिस तरह शिव परमात्मा ज्ञान प्रेम और सुख का सागर है, हम आत्माएं भी उनके समान ऊर्जा पुंज है, सर्वशक्तिमान परमात्मा को याद करते ही उनके गुण हम आत्मा में सरलता से प्रवाहित होने लगते हैं। जिस तरह सूरज के सामने जाते ही हमें बिना मांगे उनका प्रकाश और गर्मी मिलने लगती है।
ईश्वर सदा ऐसी प्राप्ति का अनुभव कराते हैं, जो हमें किसी भी प्रकार की चिंता, फिक्र की आवश्यकता नहीं होती, जैसे एक बच्चा बेफिक्र बादशाह होकर के चलता है, ऐसे ही बेफिक्र होकर के जीवन जीने की कला राजयोग मैडिटेशन से प्राप्त होती है। यह है ईश्वर के साथ संबंध जोड़ने का सरल आधार स्नेह... मात-पिता और बच्चे का सम्बन्ध। ब्रह्माकुमारी संस्था में शिव पिता के साथ बच्चे का संबंध निभाने के लिए उसे प्यार से 'शिव बाबा' कहा जाता है! कई समुदायों में पिता को और दादा जी को 'बाबा' कहा जाता है।
निष्कर्ष
धन्यवाद 😊🙏✍️
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