ॐ शाँति... राजयोग का सरल अर्थ है... निस्वार्थ भाव से परमात्मा की स्नेह भरी याद। यह सर्वश्रेष्ठ याद है। मनुष्य, मनुष्य को जब याद करते हैं, तो यह टेलीपैथिक की याद है। इसी प्रकार जब आत्मा परमात्मा को याद करती है,तो यह भी एक टेलीपैथिक कनेक्शन है। ईश्वर के साथ संबंध जोड़ने का आधार है - 'राज योग'।
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राजयोग का सरल अर्थ
राजयोग की विभिन्न अवस्थाएं
राजयोग की विभिन्न अवस्थाएं
चिंतन मनन
संवाद
एकाग्रता
अनुभूति या अनुभव
योग का सरल अर्थ है, पिता परमात्मा के साथ मधुर मिलन। कई बार व्यक्ति जब भगवान को याद करने बैठते हैं, तो याद के अनेक स्वरूप होते हैं, जैसे :--
- ईश्वर की याद में हम कोई ना कोई मनोकामना ले कर बैठते हैं।
- ईश्वर को हम अपनी स्वार्थ पूर्ति के लिए याद करते हैं।
- ईश्वर को हम अक्सर फरियादी के रूप में याद करते हैं।
- ईश्वर का केवल महिमा गान करने के लिए बैठते हैं।
- ईश्वर के आगे लिखी हुई प्रार्थना को नियम प्रमाण करने के लिए बैठते हैं।
यह तो है आम आदमी द्वारा ईश्वर को याद करने के तरीके... जिन्हे हम सभी हमेशा से करते आ रहे हैं...हे प्रभु मेरा यह काम हो जाए, मुझे यह प्राप्त हो जाए, मेरे सामने यह परिस्थितियां क्यों आई? अमुक ने मेरे साथ यह क्यों किया? हे प्रभु! यह कर दो यानी कि हम ईश्वर से फरियाद ही करते रहते हैं ! यह सब करने में हमें ईश्वर के मधुर मिलन का अनुभव नहीं होता। हम परमात्मा की स्तुति करते हैं,उनकी महिमा गान करते हैं, यह सब करते भले ही उस समय हमारे मन की स्थिति बहुत अच्छी रही..।कोई बुरा विचार व नकारात्मक विचार नहीं आया..हमने बहुत अच्छा महसूस किया... लेकिन उसके बाद क्या? यह अल्पकालीन सुख होता है! हम अपनी बात,अपनी शिकायत, अपनी प्रार्थना करके आ जाते हैं! क्या इसके बदले में परमात्मा भी हमसे कुछ कहना चाहता है? या कहता है?क्या हमने कभी उसको सुनने की कोशिश की है? क्या इस बात पर हमने कभी विचार मंथन किया है? नहीं किया तो चलिए देखते हैं....क्या यह हो सकता है?
राजयोग मेडिटेशन
जब साइलेंस में हम बैठते हैं, तो कुछ ईश्वर को कहते भी हैं, और साइलेंस में कुछ उसका सुनते भी है। कहा जाता है...'साइलेंस इज द बेस्ट कॉल ऑफ कम्युनिकेशन'। दो आत्माएं जब मिलती हैं, भले मुख से कुछ वचन ना भी कहे, लेकिन आपस में साइलेंस मीटिंग होती है, इस प्रकार मेडिटेशन माना 'साइलेंस मीटिंग विद गॉड'। यानी कि ईश्वर के साथ साइलेंस में मिलन का अनुभव करना। कुछ सकारात्मक भावनाएं मन में उत्पन्न भी होती हैं...…. टेलीपैथी के माध्यम से उसको पहुंचाते भी हैं, साथ ही साथ उसका कुछ सुनते भी हैं कि कुछ वह भी मुझे कह रहा है.... वह महत्वपूर्ण बातें मुझे कह रहा है.... जो मुझे मिस नहीं करनी है...यह है मेडिटेशन।
राज योग में चिंतन की अवस्था
यह राजयोग मेडिटेशन की पहली अवस्था है इस अवस्था में जब हम मेडिटेशन में बैठते हैं..तो ऐसा नहीं है कि एक बार में ही हमारे बुरे विचार समाप्त हो जाएंगे और हमारा योग लगने लगेगा..इस परिस्थिति में संघर्ष की स्थिति जरूर महसूस होती है.. इसलिए इसको विचार सागर मंथन की स्थिति कहा जाता है।
जिस प्रकार सागर मंथन में जोकि देवताओं और असुरों के मध्य हुआ था, उसमें सबसे पहले विष निकलता है, और अंत में अमृत का कलश निकलता है, उसी प्रकार से राज योग की विचार सागर मंथन की स्थिति में बहुत अधिक नकारात्मक विचार, व्यर्थ विचार, नकारात्मक संस्कार, बुरी भावनाएं व्यक्ति को अधिक परेशान कर सकते हैं... जो कि राजयोग की शुरुआत में ऐसी ही मनुष्य की स्थिति होती है, जो कि सामान्य अवस्था है।
क्योंकि होता यह है कि जब हम अपने मन को पॉजिटिव थॉट्स देने लगते हैं...और मन इन को समझने लगता है,और रियलाईजेशन (realization )की प्रक्रिया शुरू हो जाती है, तो मन पर दूसरी तरफ से नेगेटिव विचार भी तीव्रता से ( forcefully )आक्रमण करने लगते हैं... इस स्थिति में आकर हम अक्सर घबरा जाते हैं ! इस समय में हमें डरना नहीं है, इस पहली स्थिति से हर एक को गुजरना पड़ता है, यह एक संघर्ष है,और मन का युद्ध हर एक को लड़ना पड़ता है।
जिस प्रकार तन के विष को निकालने के लिए अनेक इलाज किए जाते हैं, उसके बाद ही शरीर निरोगी होता है,उसी प्रकार योग की पहली स्थिति में नकारात्मक विचारों का अत्यधिक आक्रमण हमें शांत मन की ओर भेजता है, जिस प्रकार सागर मंथन में शंकर जी ने विष का पान कर लिया था...उसी प्रकार राजयोग मेडिटेशन में परमात्मा शिव हमारे विष समान नकारात्मक विचारों का विनाश कर देते हैं । शुरू में जो एक संघर्ष है,और बाद में विचारों में अमृत धारा बहने लगती है। जब हम अभ्यास के इस पथ पर अग्रसर होते हैं..। तभी हम प्रभु मिलन का सुखद अनुभव भी कर सकते हैं।
राजयोग में संवाद की अवस्था
यह राजयोग की दूसरी अवस्था है। जब हमारा ईश्वर के साथ का संबंध हो और जितना गहरा संबंध हो,उतना प्यार से बातें अपने आप होने लगती हैं ! सोचना नहीं पड़ता कि अभी मैं क्या बातें करूं । जिसको कहा गया...प्रभु मिलन का एक सुखद अनुभव, रूह रुहान की अवस्था, ईश्वर के साथ संवाद, परमात्मा के साथ हृदय का वार्तालाप। जिस तरह मनुष्य मनुष्य के साथ वार्तालाप करता है, तो कोई ना कोई संबंध का आधार होता है, और उस संबंध के हिसाब से ही वार्तालाप होती है, तो जैसा माहौल.. जैसा संबंध, वैसा वार्तालाप। आज दिन तक हमारा ईश्वर के साथ का वार्तालाप कैसा रहा, किसी का मांगने का स्वरूप रहा,तो किसी का फरियादी का स्वरूप रहा। लेकिन यह स्नेह भरा वार्तालाप होने के लिए तो संबंध का आधार चाहिए । कितने संबंध है...जो हम ईश्वर के साथ जोड़ सकते हैं...मनुष्य के अति निकट के 5 संबंध होते हैं :----
- ईश्वर के साथ माता पिता और बच्चे का संबंध ≈
- ईश्वर के साथ टीचर और स्टूडेंट का संबंध ≈
- ईश्वर के साथ गुरु और शिष्य का संबंध ≈ यह तीन संबंध ऐसे हैं जहां हम लेते बहुत अधिक हैं, और देते बहुत कम है, जैसे कि कहा जाता है....कितना भी करो माता-पिता का ऋण कभी नहीं चुका सकते और ना ही टीचर और गुरु का ऋण चुका सकते हैं।
- ईश्वर के साथ दोस्त और सखा का संबंध ≈ इस संबंध में लेना भी है, और देना भी है।
- ईश्वर के साथ पति पत्नी का संबंध ≈ इस संबंध का आधार कुछ वायदे और प्रतिज्ञा है।
सती अनसूया ने तो परमात्मा को अपना बच्चा बना दिया। इसी तरह सब संबंधों का अनुभव, एक ईश्वर के साथ कर सकते हैं, यह कोई कठिन बात नहीं है सहज है। जिस याद में हमारा संबंध दिनोंदिन गहरा होता जाएगा, अनुभव होगा..जैसे हम उसके नजदीक हैं, ऐसा प्यार भरा रिश्ता, ऐसी प्यार भरी बातें,कभी खत्म ही नहीं होंगी! इसे ही परमात्मा के साथ 'रूहरूहान 'की अवस्था कहा जाता है !
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धन्यवाद 😊🙏✍️
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