स्वीकार भाव
ॐ शाँति...आज हर इंसान असली खुशी की तलाश में भटक रहा है ,असली खुशी कहां है?
वर्तमान में उसे धन -दौलत, प्रतिष्ठा, नाम -शोहरत, सुख -सुविधा, मनोरंजन आदि में ढूंढता है..... तो क्या खुशी इन बातों से मिल सकती हैं? नहीं ,असली खुशी मन के पार इच्छाओं के पीछे, मानव की पूर्व अवस्था मे छिपी हुई है..….उस अवस्था तक पहुंचने का सूत्र 'स्वीकार भाव' से शुरू होता है।
वर्तमान में उसे धन -दौलत, प्रतिष्ठा, नाम -शोहरत, सुख -सुविधा, मनोरंजन आदि में ढूंढता है..... तो क्या खुशी इन बातों से मिल सकती हैं? नहीं ,असली खुशी मन के पार इच्छाओं के पीछे, मानव की पूर्व अवस्था मे छिपी हुई है..….उस अवस्था तक पहुंचने का सूत्र 'स्वीकार भाव' से शुरू होता है।
इस लेख में....
स्वीकार भाव क्या है, कैसे यह हमारी चेतना में परिवर्तन लाता है? यह हमारे जीवन के दृष्टिकोण को बदलकर समस्याओं को स्वीकार करना सिखाता है। यह हमें अतीत के दुख से मुक्ति दिलाता है। रिश्तो में स्वीकार भाव हमारे संबंधों को मजबूत बनाता है।
हमारी उड़ान" का लक्ष्य है……
स्वयं में बदलाव लाकर अपनी जिंदगी को खुशनुमा बनाना।
स्वयं में बदलाव लाकर विश्व परिवर्तन करना।
इस श्रृंखला में हम स्वीकार के नियम से समझ रहे हैं कि स्वीकार करना, पलायन नहीं है,बल्कि उड़ान भरना है। स्वीकार भाव आसक्ति को हटा करके हमारा ध्यान लक्ष्य पर केंद्रित करता है ,यह हमें जबरदस्ती कार्य करने से भी रोकता है ताकि हम परिस्थिति और आवश्यकतानुसार कार्य कर पाये। भगवत गीता में 'अनासक्त भाव' से कार्य करने के लिए बताया गया है।
स्वीकार करना हम सबके लिए एक छोटा सा कदम है, लेकिन यह कदम हमारी चेतना में बहुत बड़ा परिवर्तन लाता है, स्वीकार करते ही उसी क्षण कई सारे नए आयाम हमारे सामने खुलने लगते हैं ,और बहुत सारी सकारात्मक चीजों को हम अपने जीवन में आकर्षित करने लगते हैं.. क्योंकि आकर्षण का यह नियम है कि हम जिस चीज पर ध्यान देते हैं, वह हमारे जीवन में कई गुना बढ़ जाती है। ब्रह्मांड से भरपूर पाने के लिए हम उचित पात्र बन जाते हैं।
• अतीत को स्वीकारते ही हमारा मन पुरानी घटनाओं के दुख से मुक्ति पा लेता है।
• दर्द और बीमारी का स्वीकार भाव हमारे दुख और तकलीफ को 50 परसेंट तक कम कर देता है।शरीर में बीमारी है उसकी चिकित्सा हो रही है ,लेकिन हमारा मन हल्का हो जाता है और सकारात्मकता की तरफ मुड़ जाता है।
• रिश्तो में स्वीकार भाव एक महत्वपूर्ण पड़ाव है-- सामने वाले के गुणों और अवगुणों को स्वीकार करना।
स्वयं से पूछिए क्या मैं सामने वाले को उसकी कमियों सहित अपना सकता हूं ?इस तरह थोड़ा-थोड़ा करके सामने वाले के हर अवगुण को स्वीकार करते जाएं, यह याद रखें आप किसी का नकारात्मक व्यवहार स्वीकार कर रहे हैं। इसका यह अर्थ नहीं है कि गलती नहीं बतानी है ,उस व्यक्ति को व्यवहार के बारे में बता सकते हैं।
स्वीकार की एक छोटी सी प्रक्रिया हमारे जीवन में शारीरिक, भावनात्मक, सामाजिक तथा आर्थिक क्षेत्रों पर भी असर करती है, और हम अपने को चेतना के नए और उच्च स्तर पर पाते हैं।
समस्या को स्वीकार करना सीखते ही आप इसे अपनी सीढ़ी भी बनाने लग पड़ते हैं अथार्त खोने के बजाय इसमें आपको लाभ दिखाई देने लगता है । यह समझ जीवन में आने वाली समस्याओं के प्रति आपका दृष्टिकोण हमेशा के लिए बदल देती है।जैसे कि :--• अतीत को स्वीकारते ही हमारा मन पुरानी घटनाओं के दुख से मुक्ति पा लेता है।
• दर्द और बीमारी का स्वीकार भाव हमारे दुख और तकलीफ को 50 परसेंट तक कम कर देता है।शरीर में बीमारी है उसकी चिकित्सा हो रही है ,लेकिन हमारा मन हल्का हो जाता है और सकारात्मकता की तरफ मुड़ जाता है।
• रिश्तो में स्वीकार भाव एक महत्वपूर्ण पड़ाव है-- सामने वाले के गुणों और अवगुणों को स्वीकार करना।
स्वयं से पूछिए क्या मैं सामने वाले को उसकी कमियों सहित अपना सकता हूं ?इस तरह थोड़ा-थोड़ा करके सामने वाले के हर अवगुण को स्वीकार करते जाएं, यह याद रखें आप किसी का नकारात्मक व्यवहार स्वीकार कर रहे हैं। इसका यह अर्थ नहीं है कि गलती नहीं बतानी है ,उस व्यक्ति को व्यवहार के बारे में बता सकते हैं।
इस तरह स्वीकार करने के बाद उस व्यक्ति के प्रति ,आपकी बोलचाल में नकारात्मक भाव या कटुता नहीं होगी ,जिस वजह से आपकी बात असरकारक सिद्ध होगी।
कई बार जिंदगी में ऐसा भी होता है, स्वीकार करना मुश्किल लगे तब क्या करें?
जब ऐसा हो तो थोड़े-थोड़े अंतराल के बाद स्वीकार करने की कोशिश करें 'क्या अब मैं इसे स्वीकार कर सकता हूँ ?'
स्वीकार नहीं हो रहा हो तो इस अस्वीकार की अवस्था को भी स्वीकार करें (अपने अंदर के नकारात्मक भावों को स्वीकार करें )और अपने आप से पूछें ,'यह मुझे स्वीकार क्यों नहीं हो रहा ?'
एक अन्य उपाय द्वारा पहले घटना का सिर्फ थोड़ा सा हिस्सा स्वीकार करें ,फिर घटना के छोटे-छोटे हिस्सों को स्वीकार करना शुरू कर दें, यह प्रयोग आपको पूर्ण घटना को स्वीकार करने में मदद करेगा।
स्वीकार करने की जो बातें यहां बताई गई ,वो आपको आनंद और खुशी की राह पर ले जाने के लिए मार्गदर्शन करेंगी। स्वीकार भाव के अनोखे प्रयोग तथा विस्तार आप और अधिक जानना चाहते हैं तो सरश्री की पुस्तक स्वीकार का जादू' पढ़े।
कई बार जिंदगी में ऐसा भी होता है, स्वीकार करना मुश्किल लगे तब क्या करें?
जब ऐसा हो तो थोड़े-थोड़े अंतराल के बाद स्वीकार करने की कोशिश करें 'क्या अब मैं इसे स्वीकार कर सकता हूँ ?'
स्वीकार नहीं हो रहा हो तो इस अस्वीकार की अवस्था को भी स्वीकार करें (अपने अंदर के नकारात्मक भावों को स्वीकार करें )और अपने आप से पूछें ,'यह मुझे स्वीकार क्यों नहीं हो रहा ?'
एक अन्य उपाय द्वारा पहले घटना का सिर्फ थोड़ा सा हिस्सा स्वीकार करें ,फिर घटना के छोटे-छोटे हिस्सों को स्वीकार करना शुरू कर दें, यह प्रयोग आपको पूर्ण घटना को स्वीकार करने में मदद करेगा।
स्वीकार करने की जो बातें यहां बताई गई ,वो आपको आनंद और खुशी की राह पर ले जाने के लिए मार्गदर्शन करेंगी। स्वीकार भाव के अनोखे प्रयोग तथा विस्तार आप और अधिक जानना चाहते हैं तो सरश्री की पुस्तक स्वीकार का जादू' पढ़े।
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