कृतज्ञता के साथ स्वीकार भाव


      कृतज्ञता और आभार क्या है ,इसका हमारे जीवन में क्या महत्व है, यह तो हमने समझ लिया लेकिन ये गुण हमारी जिंदगी में कहां तक सफलता और खुशी हासिल करा सकते हैं ,कैसे इन्हें अपनी जिंदगी का हिस्सा बनाएं ताकि हमें हमारी मनचाही चीजें*सुगमता से प्राप्त हो सके और उसमें निरंतरता भी बनी रहे।
(
*चीजें- भौतिक- घर ,गाड़ी, बंगला ,संपत्ति ,नौकरी ,धन संपदा आदि l
 अभौतिक वस्तुएं -ईश्वर ,ब्रह्मांड, प्रकृति, आंतरिक सुख, खुशी, संतुष्टि आदि ) 
 इस लेख में....
     हमारे जीवन में कृतज्ञता आभार और धन्यवाद बहुत जरूरी है लेकिन उन्हीं के साथ स्वीकार का भाव भी जरूरी है। पहले स्वीकार का भाव और उसके पीछे कृतज्ञता का भाव आता है। स्वीकार भाव के साथ खुशी भी बढ़ती है। तभी हमारा जीवन बदलता है।

"हमारी उड़ान" का लक्ष्य है……
स्वयं में बदलाव लाकर अपनी जिंदगी को खुशनुमा बनाना।
स्वयं में बदलाव लाकर विश्व परिवर्तन करना।

 स्वीकार भाव के लिए  हमें आत्म चिंतन और आत्म विश्लेषण करना होगा....

स्वीकार का नियम  --सरश्री ने कहा है -हम जो हैं ,जैसे हैं, या हमारे पास जो भी ईश्वर द्वारा प्रदत्त है उसे उसी रूप में स्वीकार करें क्योंकि स्वीकार के साथ खुशी का गहरा रिश्ता है- कैसे ?चलिए देखते हैं...

 स्वीकार करने के लिए एक छोटा सा प्रयोग 
 
     जब भी हमारे जीवन में छोटी-छोटी घटनाएं आती है ,दुख आता है तो वह छोटी-छोटी घटनाएं हमारे हृदय पर नकारात्मक प्रभाव डालती हैं उस समय हमें एक मंत्र का इस्तेमाल करना है, हाथ की मुद्रा बना करके स्वयं से यह प्रश्न पूछना है (क्या मैं इस घटना को स्वीकार कर सकता या सकती हूं?) जवाब आता है-हाँ मैं इसे स्वीकार कर सकती हूं l इस तरह स्वीकार करते ही ,स्वीकार का जो आनंद है वह आपको महसूस होगा और साथ ही आपके जीवन में बदलाव शुरू हो जाएगा ।

स्वीकार भाव का एक प्रयोग

            इस प्रयोग को आप अपनी छोटी और बड़ी परेशानियों में कर सकते है l
रोजमर्रा की जिंदगी में कई प्रश्न हमें परेशान करते हैं --
  • यह विचार क्यों आ रहे हैं ?
  • ये इस तरह के क्यों है ?
  • मेरे साथ क्या हो रहा है ?
  • मैं ऐसा क्यों हूं?
  • मैं इस तरह का क्यों नहीं हूं ?
     इन प्रश्नों को रोकने से मन अशांत हो कर थकावट महसूस करता है,और उचित समाधान नहीं खोज पाता,  परंतु जब हम रुक कर अपने से पूछे --क्या इसे स्वीकार कर सकते हैं ?जवाब-- हां कर सकते हैं। स्वीकार करते ही हमारा मन आनंद को महसूस करते हुए समाधान के लिए तैयार हो जाता है।
         
     कभी ऐसा भी हो सकता है -मन अस्वीकार को स्वीकार ही ना करना चाहे, उदाहरण यदि किसी को चिंता सता रही है ,जो दूर नहीं हो रही है तब आप अपने से पूछे-- क्या मैं यह चिंता स्वीकार कर सकता हूं? तो जवाब आएगा ..ठीक है चिंता है ,मैं इसे स्वीकार कर सकता हूं, इस तरह अस्वीकार को भी स्वीकार कर लिया तो नई चीज तैयार होगी।
           एक प्रश्न यह भी उठता है, स्वीकार करके हम उस समस्या पर काम न करें -अक्सर लोग इसका यही अर्थ लगा लेते हैं,जबकि ऐसा नहीं है।

  जब हम घटनाओं को अस्वीकार करते हैं,  तो उस समस्या को कैसे सुलझाते हैं --जैसे कि हमने अपना एक हाथ पीछे बांध दिया है...और एक ही हाथ से समस्या सुधार रहे हैं, जबकि सामान्य बुद्धि कहती है... समस्या होने पर दोनों हाथ खोल करके उसका समाधान करें।
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'तो ठीक है ,इस तरह हो रहा है , स्वीकार करें ,अब हम क्या कर सकते हैं और वह करें।'
 स्वीकार करने से हमारा जीवन बदलता है 
• स्वीकार का भाव हमारी मनोदशा बदल देता है।
• स्वीकार का भाव नकारात्मकता को हटाता है।
• स्वीकार का भाव हमारे विचारों में स्पष्टता लाता है।
• स्वीकार के भाव से हमारी एकाग्रता बढ़ती है।
• स्वीकार के भाव द्वारा बिना किसी तनाव के हम अपनी परिस्थितियों को संभाल पाते हैं।
• स्वीकार के भाव द्वारा हमारा मन डर, चिंता, क्रोध से हट करके समाधान खोजने में जुट जाता है।
स्वीकार ना करके उलझता  मन
स्वीकार करके प्रसन्न मन
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