- पांच बातें जिनके द्वारा परमात्मा को पहचाने
- परमात्मा के विषय में कुछ मिथक:---
- क्या नेचर गॉड है?
- क्या आत्मा ही परमात्मा है?
- क्या परमात्मा सर्वव्यापी है
- क्या परमात्मा ब्रह्म है?
पांच बातें जिनके द्वारा परमात्मा को पहचाने
परमात्मा उसी को कहेंगे.....जो सर्व धर्म मान्य हो, सर्वोच्च हो, सर्वोपरि हो, सर्वज्ञ हो, सर्व गुणों में अनंत हो !! यह वह कसौटी है... जिसको अंग्रेजी में भी कहा गया है... यूनिवर्सल ट्रुथ, सुप्रीम अथॉरिटी, अब हमें यह देखना है कि यह पांचो बातें किस के साथ, एक साथ फिट होती है, उसी को परमात्मा कहेँगे लेकिन उससे पहले परमात्मा के विषय में कुछ और भी मिथक हैं.... जैसे अक्सर कहा जाता है :--प्रकृति ही भगवान है यानी कि नेचर इज गॉड ! या फिर आत्मा ही परमात्मा है !या फिर परमात्मा सर्वव्यापी है या फिर ब्रह्म ही ईश्वर है, आदि आदि।
पांच बातें जिनके द्वारा परमात्मा को पहचाने
हम कहते हैं नेचर इज गॉड... तो क्या नेचर के साथ यह पांचो बातें (सर्व धर्म मान्य हो, सर्वोच्च हो, सर्वोपरि हो, सर्वज्ञ हो, सर्व गुणों में अनंत हो )लागू होती है?? क्या सभी लोग प्रकृति को परमात्मा के रूप में स्वीकार करते हैं? बहुत सारे वैज्ञानिक और मनीषियों का कहना है कि परमात्मा रचयिता है और प्रकृति उसकी रचना... प्रकृति के वर्णन में कहा गया है.... वो कौन चित्रकार है? तो रचना रचयिता कैसे बन गई? एक सत्य बात समाज में और कहीं गई है कि संसार का खेल 3 सत्ताओं में चलता है....
- आत्मिक सत्ता जैसे - मैं, आप
- परमात्म सत्ता जैसे - ईश्वर या परमात्मा
- प्रकृति सत्ता जैसे - प्रकृति के 5 तत्त्व... जल, वायु, पृथ्वी,आकाश,अग्नि
यह तीनों ही अनादि और अविनाशी हैं... इनमें से दो आत्मिक और प्राकृतिक में परिवर्तन संभव है.... लेकिन विनाश नहीं होता, रूप बदल जाता है.... जैसे प्रकृति सुखदाई और दुखदाई दोनों रूप बदलती है... और आत्मा भी पुण्यात्मा और पापात्मा बनती है.... लेकिन परमात्म सत्ता कभी नहीं बदलती !! हम अज्ञानता वश 'प्रकृति परमेश्वर है' कहते हैं, जिसे की किसी भी धर्म में इस रूप में मान्यता नहीं मिली है !
आत्मा सो परमात्मा यह कहना कहां तक सत्य है? सागर से बुदबुदा निकला और सागर में समा गया.. वैसे ही हम सभी परमात्मा के अंश इस संसार में आए फिर अंत में जाकर के उस परमात्मा में समा जाएंगे अथार्त परमात्मा बन जाएंगे.? .. क्या यह कहना सत्य है?
जी नहीं..... आत्मा और परमात्मा का अस्तित्व कभी समाप्त नहीं होता है, हमारे अंदर आत्मा विराजमान है.. हम आत्माएं पुण्यत्मा, पापात्मा, महात्मा, देवात्मा बन सकते हैं... लेकिन परमात्मा नहीं। हम भगवान के मंदिर में जाते हैं, और गाते हैं,.. "त्वमेव माता श्च पिता त्वमेव, त्वमेव बंधु शच सखा त्वमेव"अगर वह माता पिता है.. तो हम परमात्मा कैसे हो सकते हैं.. कोई भी इंसान खुद का बाप नहीं बन सकता... पिता भी अलग है.. पुत्र भी अलग है... हां पिता जैसा बन सकता है.। परमात्मा कोई डिग्री नहीं है, जो हम ले ले ! परमात्मा पिता है, इसलिए आत्मा ही परमात्मा कहना अज्ञान हो जाता है।
परमात्मा सर्वव्यापी है यह सही नहीं... कण-कण में ईश्वर है, कोई स्थान नहीं जहां ईश्वर ना हो, मेरे में भी ईश्वर है,आप में भी ईश्वर है,आत्मा भी है, परमात्मा भी बैठा हुआ है, यह कहां तक सत्य है?
आज संसार में चारों ओर पापाचार, भ्रष्टाचार, अनैतिकता, खून खराबा फैला हुआ है, यदि हमारे अंदर परमात्मा है... या वह सब जगह है... हमें देख रहा है... तो इन सब अनैतिक कार्यों के लिए हमें रोकता क्यों नहीं है?? एक ओर तो हम उसे सर्वशक्तिमान कहते हैं... तो क्या उसके पास आत्मा को रोकने की शक्ति नहीं है?? तो हम उसे सर्वशक्तिमान कैसे कह सकते हैं?
हमारे शास्त्रों में यह कह दिया गया है कि परमात्मा कण कण में व्यापक है..यह सही नहीं.... यह एक भावनात्मक सत्य है... कहा जाता है कि पहले के समय में जो ऋषि मुनि थे, वह अपने सिद्धि के बल पर आने वाले समय को देख लेते थे और उन्होंने यह देखा कि आने वाले कलयुग में घोर अत्याचार और पापाचार होंगे !! उन्होंने सोचा कि मनुष्यों को इन सब बुराइयों से कैसे बचाया जाए?
तो इसलिए उन लोगों ने शास्त्रों में यह बातें लिख दी कि हे मानव,.. जब तू पाप कर्म करता है, तो यह ना समझना कि कोई तुझे नहीं देख रहा, भगवान सब जगह है... उसकी हजार आँखें है, वह तुझे देख रहा है.. और इस भय को ले करके वे पाप कर्म ना करें।
परमात्मा की उपस्थिति में अधर्म बढ़ जाए तो परमात्मा के होने का क्या मतलब !! परमात्मा की गैर हाजरी है तभी तो इतना अधर्म है ! गीता में स्वयं परमात्मा द्वारा कहा गया है.. "यदा यदा ही धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत अथार्त.. जब जब भारत में धर्म की ग्लानि होती है अनाचार बढ़ते हैं तो मैं धरती पर आता हूं.." इसका तो यह हुआ कि ईश्वर धरती पर नहीं रहते, वे ऊपर से आते हैं क्योंकि अनिश्चितता की स्थिति में अक्सर लोग हाथ ऊपर दिखाकर कहते हैं, ऊपरवाला जाने.. ऊपरवाला यानी कि ईश्वर परमात्मा !
दूसरी बात यह भी कही जाती है कि ईश्वर मुझे कण कण में व्याप्त दिखता है यह सही नहीं.. . द्वापर युग में जो भक्त आत्माएं हुए जैसे मीराबाई, रैदास, उनको इतनी लगन थी परमात्मा के साथ...... इसी प्रीति के कारण उनके मानस पटल पर हमेशा उस प्रीतम की छवि ही नजर आती थी...... तभी उस अलौकिक प्यार में आकर के उन्होंने कहा... "जहां देखूं वहां तू ही तू है " जो एक भावनात्मक सत्य है, सिद्धांतिक नहीं है !
हम कहते हैं... ब्रह्म ईश्वर है... लेकिन ब्रह्म एक महा तत्व है जो पांच तत्वों के पार छठा तत्व है लेकिन परमात्मा कोई तत्व नहीं है ! ब्रह्म परमधाम का ही एक दूसरा नाम है, जहां ईश्वर रहते हैं
परमात्मा निराकार है यह सही नहीं.... निराकार का अर्थ क्या है? दुनिया में देखा जाए तो ऐसी कोई चीज नहीं... जिसका नाम और स्वरूप ना हो, भले हवा दिखाई नहीं पड़ती.... लेकिन उसका नाम है हवा.. और चित्रकार जब चित्र में उसका चित्र बनाता है, तो आकार द्वारा दिखाता भी है, हर रचना का नाम और रूप अवश्य है... भले वह दिखाई नहीं देती हो !! क्या परमात्मा, जो स्वयं रचयिता है ! बिना नाम और स्वरूप का होगा! उसका भी अपना नाम और रूप है !
निष्कर्ष
जैसे मनुष्य का पिता मनुष्य...... जानवर का पिता जानवर होता है, वैसे ही आत्मा का पिता परमात्मा है। जैसे आत्मा का स्वरूप दिव्य ज्योति बिंदु है, वैसे ही उसके पिता का स्वरूप भी ज्योति बिंदु है। ज्योति का कोई आकार नहीं होता और इसलिए परमात्मा को कहा गया, "निराकार "जिसका कोई आकार, आकृति नहीं उसको हर धर्म में मान्यता दी गई है। परमात्मा का नाम गुणवाचक और कर्तव्य वाचक है... शिव का अर्थ है... सदा कल्याणकारी.... इसलिए उसे सदाशिव कहते हैं। शिव का अर्थ है पवित्र स्वरूप, परमपिता परमात्मा एवर प्योर है। अगर इस कसौटी पर कस कर देखें कि क्या सभी धर्म वाले उसको परमात्मा के रूप में स्वीकार करते हैं? कहां तक करते हैं? कैसे करते हैं? अगली पोस्ट में हम विस्तार से देखें, कि परम पिता परमात्मा की मान्यता सभी धर्मों में किस प्रकार है??
धन्यवाद 😊🙏✍️
आप भी परमात्मा को ढूंढ रहे हैं? साथ ही मन की शांति और संतुष्टि भी चाहते हैं ! तो परमात्मा की खोज में मेरे साथ बने रहिए... आगे आने वाले 2 लेखों में हमारी चर्चा के विषय होंगे... क्या परमात्मा है? परमात्मा कौन है? वह क्या है? उसका आकार क्या है? उसके गुण क्या है? परमात्मा को मानने की जो कसौटी हमने ऊपर बताई है क्या उस द्वारा परमात्मा का सत्य परिचय पा सकते हैं ? परमात्मा के विषय में शास्त्रों में बताए गए बहुत सारे वाक्यांश समाज में फैले हुए हैं क्या वे परमात्मा के विषय में सही है? क्या हमें उन सब के विषय में और भी सोचना चाहिए.. क्या पुरानी मान्यताओं और अंधविश्वासों को जैसे के तैसे अपना लेना चाहिए.. या इन पर फिर से विचार करना चाहिए?
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