ॐ शांति... ईश्वर द्वारा बनाई गई इस पृथ्वी और संसार की सर्वश्रेष्ठ और अद्भुत रचना है....मनुष्य! जी हां.... सुंदर तन, खूबसूरत मन, शक्तिशाली और विचारशील मस्तिष्क। लेकिन इस अद्भुत मन मस्तिष्क में मनुष्य ने स्वयं ही एक चिंता रुपी बीच डाल दिया।
इस लेख में... हम यह जानेंगे कि चिंता और चिंतन क्या हैं?
यह चिंता है क्या?
चिंता किस तरह हमारे जीवन को प्रभावित करती है?
चिंता का हमारे जीवन में आने के कारण क्या है?
क्या चिंता चिता समान है?
चिंता हमारी रोज की जिंदगी में कैसे आती है?
चिंता को हम कैसे शुभ चिंतन में बदले?
मानव को स्वस्थ और सुखी रखने के हर साधन आज पृथ्वी पर उपलब्ध है, और इन साधनों की प्राप्ति कराई प्रकृति ने…. सबसे पहले हमें प्रकृति ने सुंदर स्वास्थ्यवर्धक फल, फूल, पर्वत, नदियां यह सब मानव को उपहार में दिया ! खाने के लिए वनस्पति , विभिन्न अनाज यह सब धरती की छाती पर उगा दिया...
जीवन का स्तर सबसे अधिक ऊंचा और संपन्न बनाने के लिए और दिन प्रतिदिन उन्नति की चरम सीमा को पार करने के लिए प्रकृति ने मनुष्य को एक संपन्न मस्तिष्क भी दिया….. वह मस्तिष्क जिसके द्वारा एक इंसान सभी जीवों में बहुत अधिक बुद्धिमान और सर्वश्रेष्ठ जाना जाता है | उस मस्तिष्क को भ्रष्ट करने के लिए उसमें एक चिंता नमक बीज को स्थान दे दिया… मनुष्य ने क्रोध, मद, लोभ, मोह की प्रकृति अपनायी और इसके साथ ही उसके जीवन में चिंता का जन्म (आगमन) हुआ |
चिंता क्या है
चिंता वह प्रवृत्ति है... जो प्रत्येक उतार-चढ़ाव और प्रत्येक भाव के साथ उत्पन्न हो सकती है... आज के इस भौतिकवादी युग में मनुष्य के पास चिंताओं का अथाह भंडार है.. क्योंकि जीवन में समस्याएं और परेशानियां बहुत है..और यही चिंताओं की जननी है |
यदि देखा जाए तो जीवन में समस्याएं और परेशानियां तो आते ही रहते हैं परंतु आज के इस समय में जबकि इंसान के अंदर धैर्य हीनता और असंतुष्टता की भावना अपनी जड़ें जमा चुकी है, ऐसे में जीवन की छोटी सी समस्या भी मनुष्य को चिंता और तनाव दे देती है…. वह यह भूल जाता है कि उसके पास एक शक्तिशाली मस्तिष्क है, जिसके द्वारा वह अपनी चिंताओं को परेशानियों को चुटकियों में हल कर सकता है….
चिंता के दुष्प्रभाव
प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक जुंग ने चिंता के संबंध में कुछ कार्य किए, उनका कहना है कि चिंता मनुष्य का दिमाग कुंठित कर देती है, उसका दिमाग़ उचित निर्णय नहीं ले पाता….. दिमाग से हाथ धो बैठने के बाद इंसान आत्म विश्लेषण कैसे कर सकता है?? चिंता का काम है…. मनुष्य के मस्तिष्क पर आक्रमण कर उसे नकारा बना देना... चिंता का पहला लक्ष्य ही मस्तिष्क है, यह विचारों से उत्पन्न होती है, और दिमाग में कुंडली मारकर बैठ जाती है, इसका जहर जीते जागते और हंसते मनुष्य को जिंदा लाश बना देता है... इस तरह से जुंग ने चिंता को सबसे खतरनाक दुश्मन की संज्ञा दी है |
चिंता के कारण
जैसे-जैसे मनुष्य का विकास सभ्यता की ओर होता जाता है, वैसे वैसे उसकी आवश्यकताएं भी बढ़ती जाती हैं, आज के युग में बहुत कुछ पा लेने की होड़ मनुष्य को चिंता के सागर में डुबो देती है, जब हमारी इच्छा पूर्ति नहीं हो पाती है, तो हम परेशान हो उठे हैं, और यह शब्द 'परेशानी' ही सारी चिंता की बुनियाद है.. क्या होगा? कैसे होगा? क्यों हुआ? अब क्या होगा? आदि... परिवार की समस्याएं, साधनों की समस्याएं, किसी के व्यवहार की समस्या, परिणाम की समस्या, धन संबंधी समस्या, स्वास्थ्य संबंधी समस्या आदि यह तो है कुछ ठोस कारण... लेकिन यदि देखा जाए.. तो इन कारणों के पीछे बहुत छोटी-छोटी समस्याएं, चिंता, डर, तनाव, व्यर्थ विचार, नकारात्मक विचार, आत्मविश्वास की कमी होती है…..यहां तक कि छोटी सी चीज 'आशंका' 'अनुमान लगाना' भी हमें चिंता दे सकता है:-- जैसे कि कहीं अमुक घटना, स्थान हमारे लिए घातक ना हो जाए.. कहीं बस से दुर्घटना ना हो जाए.. कहीं यह रोग कैंसर ना हो जाए... कहीं मैं बीमार ना पड़ जाऊं.. कहीं मैं फेल ना हो जाऊं... कहीं मैं असफल ना हो जाऊं.. इस तरह के वहम और बेसिर पैर की बातें सोच सोच कर के मनुष्य इतना कष्ट उठाता है.. जितना वास्तव में घटित हो जाने के बाद भी नहीं मिलता..
चिंता चिता समान है..
जी हां... यह तो सभी को पता है कि चिंता चिता सामान है…. लेकिन चिंता से मुक्ति का उपाय नहीं पता |
हमारे जीवन में सारे दुखों का एक ही कारण है चिंता.. हम उतना दुख बीमारियों से नहीं पाते हैं, जितना उसकी चिंता से हमें कष्ट पहुंचता है, जो अप्रिय अनुभव जीवन में कभी आते ही नहीं... उनकी चिंता करके आज हम शिथिल क्यों हुए चले जा रहे हैं? हम बीमारियों से लड़ सकते हैं, विकट परिस्थितियों का सामना डटकर कर सकते हैं, परंतु इस चिंता नामक रोग का सामना हम किस प्रकार करें... जिसका कोई इलाज नहीं... जो हमारे मन और मस्तिष्क को घुन की तरह खा जाती है, हमें शून्य पर ला खड़ा करती है, चिता समान बना देती है
रोज की जिंदगी में चिंता
अधिकांशत: चिंता करने वाले सदैव अपने पक्ष में अनेक मत भी प्रस्तुत करते हुए मिलते हैं... जैसे कि एक ग्रहणी अक्सर यह कहती मिलेगी कि वह यदि चिंता ना करें, तो अपने बच्चों का पालन पोषण कैसे सकता है? यदि वह चिंता नहीं करेंगी तो परिवार के जन आलसी और लापरवाह नहीं हो जाएंगे?
एक व्यापारी सदैव ही अपने पैसे की गठजोड़ में चिंतित रहता है.. और साथ ही यह सफाई भी देता है कि यह तो स्वाभाविक है, कंपनी चलाना है, कर्मचारियों को संभालना है, तो चिंता तो करनी ही पड़ेगी.. आदि आदि
परंतु चिंता में डूबा हर व्यक्ति किसी न किसी रूप में अपने ऊपर बेकार का बोझा लादे रहता है जैसे कि कल क्या होगा? कैसे होगा? इत्यादि परंतु जिस कल की चिंता आप कर रहे हैं.. वह कल ही आएगा उससे पहले तो आज की चिंता करो जो चल रहा है... कल का क्या भरोसा... क्या पता आए भी या ना आए... तो उसकी चिंता क्यों जिसके आने का भी भरोसा नहीं... उसकी चिंता करके आज की अनमोल घड़ियों को क्यों बर्बाद करना?
चिंतन करिये.. जी हाँ
जितना कुछ आपके पास है, उसी पर संतोष करें. सफलता प्राप्ति के लिए संघर्ष उतना ही करें, जहां तक आपका शरीर, मन, मस्तिष्क सब कुछ सरलता से कर सके….. अस्तित्व विहीन होकर मशीन का रूप ना ले ले.. चिंताएं आपको अपना गुलाम ना बनाएं.. यदि आपकी सुख शांति और परिवार के खुशी के साधनों के साथ चिंता का समावेश हो जाए तो समझ लीजिए कि संघर्ष की दिशा कुछ गलत हो गई है तो उसकी गिरफ्त में आने से पहले उस कारण से हाथ खींचने ले…. जिसने आपको चिंतित किया है |
जितनी चादर है... उतना पैर पसारिए... आपका परिवार आप पर निर्भर है... अथक परिश्रम और संघर्ष आपको धन तो दे देगा… लेकिन उससे मूल्यवान आपकी मन की शांति और परिवार की खुशी है, जिसको आप गंवा बैठेंगे |
विपरीत परिस्थितियों में चिंता ना कर के चिंतन को अपनाएं...जैसे.. कहां पर गलती हुई और उन गलतियों से सीख लें और उन्हें स्वीकार करें… पढ़ें कृतज्ञता 3
यह याद रखें कि चिंताएं एक विचार हैं, ऐसे नकारात्मक विचार… जिन्हें उत्पन्न करने के जिम्मेवार हम खुद हैं! एक उदाहरण से समझाइए….
एक व्यक्ति जो मोटर कार चलाते समय अपनी स्पीड को बढ़ाता चला जाता है.. और जब ब्रेक लगाना चाहता है.. तो उसे मालूम पड़ता है कि उसके ब्रेक फेल हो चुके हैं.. इसलिए व्यर्थ रूप में इच्छाओं को मत बढ़ाइए, क्योंकि एक समय ऐसा आएगा…… जब आप की अनंत इच्छाएं जानलेवा बन जाएंगी, ब्रेक रूपी संयम शक्ति को सदैव अपने वश में रखिए…..क्योंकि बहुत कुछ पाने की ललक, आपकी कार्यकुशलता के मूल्य को नष्ट कर देती है |
अंत में....
दृढ़ता का साहस और उत्साह का अभ्यास होने से जीवन में आने वाले संकट तुच्छ हो जाते हैं…. हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि हम सर्वोच्च जीव हैं... प्रकृति ने हमको हर मूल्यवान वरदानों से आभूषित किया है.. हमें सारे पदार्थ उत्तराधिकार के रूप में प्राप्त हुए हैं.. और सारा संसार हमारा है.. फिर चिंता कैसी?? ... शांति और धैर्य के साथ उनके प्राप्ति के लिए यत्न कीजिए…... क्योंकि निरंतर उत्साह और आत्मविश्वास ही सफलता की कुंजी है | "चिंता करें या चिंतन" लेख आपको कैसा लगा? क्या आप भी चिंता करते हैं तो अबसे चिंता नहीं चिंतन करें ।
धन्यवाद 😊🙏✍️





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